Flying sikh milkha singh biography in hindi
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फ्लाइंग सिख मिलखा सिंह भारत के हि नहीं बल्कि विश्व के एथिलेट में एक महान धावक है।
जिन्हे अपनी तेज स्पीड के लिए पुरे भारत में फ्लाइंग सिख के नाम से जाना जातां है , मिलखा सिंह भारत के पहले धावक है जिन्हे कॉमनवेल्थ खेलो में स्वर्ण पदक मिला।
मिलखा सिंह का जीवन आज के युवाओ के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है, पर ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी मिलखा सिंह का बीते दिनों covid -19 से निधन हो गया।
तो आइये जानते है , उनके जीवन के कुछ पहलुओं के बारे में जिनसे हमे प्रेरणा मिले।
साधारण परिचय
राष्टीयता - भारतीय
जन्म - 20 नवम्बर 1929
- गोविंदपुरा पंजाब ( वर्तमान पाकिस्तान )
मृत्यु - 18 जून 2021
- चण्डीगढ ( भारत )
उपनाम - The flaying sikh
प्रारम्भिक जीवन -
मिलखा सिंह का जन्म 20 नम्बर 1929 को गोविंदपुरा ( वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त ) में एक सिख परिवार में हुआ। मिलखा सिंह के पिता एक किसान थे।
भारत के विभाजन के दौरान हुऐ कुछ दंगो में मिलखा सिंह अपने परिवार से बिछड़ गए, और अपने घर से दूर हो गए।
तब हालत इतने ख़राब थे। की मिलखा सिंह को पाकिस्तान में सहारा देने वाला कोई नहीं था।
तो मिलखा सिंह पाकिस्तान से भाग कर ट्रेन से दिल्ली आ गये तब उनकी उम्र करीबन 17 साल रही होगी।
स्टेशन पर कुछ हफ्ते रहने के बाद वह अपनी बहन के साथ पुराने किले के रिफ्यूजी केम्प में रहे।
फिर अपने भाई मलखान के कहने पर मिलखा ने आर्मी ज्वाइन करने का निर्णय ले लिया।
और तीन बार असफल होने के बाद चौथी कोशिश में 1951 में सेना में भर्ती हो गए।
मिलखा सिंह का वैवाहिक जीवन व परिवार -
मिलखा सिंह ने 1962 में निर्मल कोर से शादी कर ली जो की भारतीय महिला बॉलीबोल टीम की कैप्टन रह चुकी है।
मिलखा सिंह के तीन पुत्रिया व एक पुत्र जीव मिलखा सिंह (jeev milkha singh ) है , जो एक गोल्फ़र है।
जीव मिलखा सिंह भारत के पहले प्रोफ़ेशनल गोल्फ़र है , इन्हे 2007 में भारत सरकार द्वारा भारत के चोथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मनित किया गया था।
मिलखा सिंह अपने परिवार के साथ वर्तमान में चण्डीगढ के साहिबजादा अजीत सिंह नगर में रहते थे। वही 13 जून 2021 को covid - 19 के कारण पहले उनकी पत्नी व 18 जून 2021 को बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
और हमने इस महामारी के कारण देश के एक और रत्न को खो दिया।
मिलखा सिंह धावक के रूप में -
आर्मी में जाने के बाद मिलखा सिंह को पता चला की दौड़ की प्रतियोगिताएं भी होती है। इन्हे देख मिलखा सिंह को भी दौड़ में इंट्रेस्ट आने लगा और मिलखा ने आर्मी में होने वाली लम्बी रेसो मे भाग लेना शुरूकर दिया तथा आर्मी के साथ-साथ दौड़ की ट्रेनिंग करना भी शुरू कर दि।
एक बार जब वह 5 मिल की दौड़ में दूसरे स्थान पर आय तब आर्मी की तरफ से उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग के चुन लिया गया।
एक बार स्पेशल ट्रेनिंग दौरान मिलखा सिंह को उनके कोच ने सलाह दी की तुमे छोटी दौड़ दोड़नी चाहिए।
तब से मिलखा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ में मेहनत करना शुरू कर दिया।
कड़ी मेहनत के बाद पहली बार मिलखा सिंह ने पटियाला में हुई एक रेस में 400 मीटर की दौड़ को 47.5 सेकण्ड में पूरा करके नेशनल रिकॉर्ड बनाया।
जबकि उस समय का नेशनल रिकॉर्ड 48 सेकण्ड था।
इसके बाद से ही मिलखा सिंह को ओलंपिक में एशियन गेम व कॉमनवेल्थ में जाने का मोखा मिला।
मिलखा सिंह ने 1966 के मेलबर्न ओलम्पिक खेलो में 200 मीटर व 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव नहीं होने के कारण सफल नहीं हो पाए।
मिलखा सिंह ने दूसरी बार 1960 के रोम ओलम्पिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया पर वह इस बार भी फ़ाइनल में आकर असफल रहे,इस रेस में मिलखा सिंह चौथे स्थान पर रहे , मिलखा सिंह बताते है की यह हार मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार थी।
और बताया की की 1960 के रोम ओलम्पिक में जाने से पहले मेने कुल 80 रेसो में भाग लिया था जिनमे से मेने 77 रेसे जीती थी।
मिलखा सिंह ने तीसरी बार 1964 के टोक्यो ओलम्पिक में भी भाग लिया पर इस बार भी उनके हाथ असफलता ही लगी।
1958 में मिलखा सिंह ने एसियन खेलो में 200 मीटर व 400 मीटर की प्रतियोगिताओ में स्वर्ण पदक हासिल किया व राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
1958 में ही मिलखा सिंह ने कॉमनवेल्थ खेलो ( राष्ट्रमंडल खेलो) में 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता और राष्टमंडल खेलो में स्वर्ण पदक जितने वाले स्वतन्त्र भारत के पहले खिलाड़ी बन गए।
मिलखा सिंह के रिकॉर्ड -
मिलखा सिंह ने अपने जीवन का पहला रिकॉर्ड पटियाला में हुई 400 मीटर की दौड़ को 47.5 सेकंड में दौड़ कर बनाया ,जो उस समय का राष्ट्रिय रिकॉर्ड था।
इसके बाद मिलखा सिंह ने अपने ही रिकार्ड्स को तोड़ते हुए अनेक रिकॉर्ड बनाय।
मिलखा सिंह का 400 मीटर का अंतिम रिकॉर्ड 45.6 सेकंड था जो 39 साल तक नॅशनल रिकॉर्ड रहा, जिसे अंत में परमजीत सिंह ने 1998 में तोडा दिया।
यह रिकॉर्ड मिलखा सिंह ने 1960 के रोम ओलम्पिक में स्थापित किया , इसके बावजूद वह इस खेल में चौथे स्थान पर रहे।
मिलखा सिंह का 200 मीटर का अंतिम रिकॉर्ड 20.7 सेकंड था।
जबकि 1600 मीटर का अंतिम रिकॉर्ड 3.08.8 मिनट था।
मिलखा सिंह को मिले पुरस्कार व पदक -
मिलखा सिंह को मिले पदक निम्नानुसार सारणी बध है -
कॉमनवेल्थ गेम्स (राष्टमंडल खेलो ) में
स्वर्ण - 1958, कार्डिफ ( कैपिटल ऑफ़ वेल्स ) - 440 Yards( 402.33 मीटर )
एसियन गेम्स
स्वर्ण - 1958, टोक्यो ( जापान की राजधनी ) - 200 मीटर
स्वर्ण - 1958, टोक्यो ( जापान की राजधनी ) - 400 मीटर
स्वर्ण - 1962, जकार्ता ( इंडोनेसिया की राजधनी ) - 400 मीटर
स्वर्ण - 1962, जकार्ता ( इंडोनेसिया की राजधनी ) - 1600 मीटर
भारतीय राष्ट्रिय खेल
स्वर्ण - 1958, कटक ( उड़ीसा) - 200 मीटर
स्वर्ण - 1958, कटक ( उड़ीसा) - 400 मीटर
रजत - 1964, कलकत्ता ( पश्चिम बंगाल) - 400 मीटर
- 1959 में मिलखा को भारत के चौथे सर्वश्रेष्ठ सामान से सम्मानित सम्मानित किया गया।
- मिलखा सिंह को सरकार ने अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया था पर मिलखा सिंह ने इसे लेने से इंकार कर दिया।
मिलखा सिंह का रनिंग के बाद करियर -
मिलखा सिंह ने अपने इंटरव्यू में बताया है की जब में आर्मी में था तब पंजाब के cm प्रताप सिंह केरोम मेरे पास आए और मुझे पंजाब के स्पोर्ट डायरेक्टर के तोर पर पंजाब सरकार में अपनी सेवाए देने की बात कही पहले तो में आर्मी छोड़ के नहीं जाना चाहता था पर फिर कुछ दिनों के बाद मेने खेल जगत में भारत के लिए कुछ करने के इरादे से स्पोर्ट डायरेक्टर का पद स्वीकार कर लिया।
स्पोर्ट डायरेक्टर बनने के बाद मिलखा सिंह ने पंजाब का पहला स्पोर्ट स्कूल जालिंदर में खोला।
इस तरह मिलखा सिंह ने खेल जगत से सन्यास लेने के बाद 30 साल तक स्पोर्ट डायरेक्टर व एजुकेशन के क्षेत्र में काम किया।
मिलखा सिंह के बारे में रोचक तथ्य -
- एक होनहार धावक के रूप में ख्यति प्राप्त होने के बाद जब 1958 में मिलखा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ने का न्योता मिला तब उन्होंने बचापन की घटनाओ के कारण वहा जाने से इंकार कर दिया लेकिन जब नेहरूजी ने उन्हें समझाया की तुमे वहा जान चाहिए तब मिलखा सिंह पाकिस्तान जाने को तैयार हो गए,और जब वह वहा गए और दौड़े तो उनकी दौड़ देख पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने कहा की मिलखा भागा नहीं हवा से बाते करता हुआ उड़ा है।
तब से मिलखा सिंह को The Flying sikh के नाम से जाने जाना लगा।
- पाकिस्तान में मिलखा सिंह का मुकाबला 400 मीटर दौड़ में अब्दुल ख़ालिग़ से हुआ था , जो एशिया के बेहतरीन धवको में से एक थे।
- मिलखा सिंह बचपन में 10 किलोमीटर दौड़ कर स्कूल जाते थे , इस पर वह बताते है की मेरी दौड़ की नींव तब से रखी जा चुकी है।
- मिलखा सिंह के 15 भाई - बहन थे जिनमे से अधिकांश बचपन में ही भारत - पाक विभाजन के दगो के दौरान मरे गए।
- 2013 में मिलखा सिंह ने अपनी बेटी सोनिया सवलका के साथ मिलकर अपनी आत्मकथा '' The Race of My Life'' लिखी जो बहुत अधिक चर्चीत रही।
- मसहूर निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने मिलखा सिंह की आत्मकथा पर आधरित एक फिल्म ''भाग मिलखा भाग'' बनाई जिसमे मिलका सिंह का किरदार मशहूर अभिनेता फरहान अख्तर ने निभाया।
यह फिल्म 2013 में रिलीज हुई जिसे
IMDb पर 8.2 रेटिंग मिली ,तथा बॉक्स ऑफिस पर 2.1 बिलियन का कलेक्शन किया।
- मिलखा सिंह के बारे में कहते है की वह अपनी ट्रेनिंग के दौरान ट्रेनों के साथ रेस लगाया करते थे।
- 1960 के रोम की दौड़ के दौरान जब मिलखा सिंह ने देखा की वह सबसे आगे दौड़ रहे है , और इतनी गति से दौड़ रहे है की शायद वह दौड़ भी पूरी नहीं कर पाय तो उन्होंने अपनी स्पीड कम कर ली , जिससे उनकी फ्लो स्टेट टूट गई और और वह अपनी गति को बाद में बड़ा नहीं सके ,और बाकि के धावकों से पिछड़ गए।
- वह बताते है की यह हार मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार थी।
Note - आप हमे कमैंट्स में बता सकते है की आपको यह लेख केसा लगा और आप को milkha singh के प्रेरणादायक जीवन से क्या सीखने को मिला ।
और आप बता सकते है की आपको अब किस के जीवन के बारे में जानना है।
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